“भारतीय ज्ञान परंपरा: शोध संभावनाएँ” विषय पर जानकी देवी मेमोरियल महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय की भारतीय भाषा समिति एवं ज्ञान मंजूषा (हिंदी विभाग) द्वारा आईक्यूएसी के संयुक्त तत्वावधान में एक भव्य अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस संगोष्ठी में देश के विविध महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों के लगभग 200 अध्यापकों शोधार्थियों एवं प्रतिभागियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन एवं के साथ हुआ। स्वागत भाषण में संगोष्ठी की संयोजिका प्रो.संध्या गर्ग ने भारतीय ज्ञान परंपरा की समृद्धि, उसकी समकालीन प्रासंगिकता तथा शोध की नई दिशाओं पर प्रकाश डाला। संगोष्ठी के प्रथम सत्र की अध्यक्षता दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की प्रो. सुधा सिंह द्वारा की गई। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक संदर्भों में पुनर्स्थापित करने तथा शोध में उसकी उपयोगिता पर विशेष बल दिया। इस सत्र में मुख्य वक्ताओं के रूप में प्रतिष्ठित विद्वानों में पेंसिल्वेनिया से प्रो. सुरेंद्र गंभीर, जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के अध्यक्ष प्रो. जय प्रकाश नारायण, वेंकटेश्वर महाविद्यालय से सेवानिवृत प्रो. पुनीता शर्मा एवं केंद्रीय हिंदी संस्थान के पूर्व निदेशक प्रो. अनिल शर्मा जोशी ने अपने व्याख्यान प्रस्तुत किए। इन विद्वानों ने भारतीय ज्ञान परंपरा के दार्शनिक, सांस्कृतिक एवं भाषिक आयामों पर गहन चर्चा करते हुए यह प्रतिपादित किया कि भारतीय चिंतन न केवल अतीत की धरोहर है, बल्कि वर्तमान और भविष्य के शोध के लिए भी एक सशक्त आधार प्रदान करता है। संगोष्ठी के द्वितीय सत्र में प्राध्यापकों, शोधार्थियों एवं चतुर्थ वर्ष के विद्यार्थियों द्वारा शोध प्रपत्रों का वाचन किया गया। विद्यार्थियों ने भारतीय साहित्य, संस्कृति, दर्शन एवं सामाजिक मूल्यों से संबंधित विविध विषयों पर अपने शोध प्रस्तुत किए; जिनमें मौलिकता, विश्लेषणात्मक दृष्टि एवं समकालीन संदर्भों की स्पष्ट झलक दिखाई दी। संगोष्ठी के समापन सत्र की अध्यक्षता प्रो. पूरनचंद टंडन द्वारा की गई। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने पूरे आयोजन की सराहना करते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा के व्यापक महत्व पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम के अंत में महाविद्यालय की प्राचार्या प्रो. स्वाति पाल ने अपने विचार व्यक्त करते हुए इस विषय की प्रासंगिकता को रेखांकित किया तथा सभी प्रतिभागियों को शुभकामनाएँ प्रेषित कीं। साथ ही यह चिंता भी जाहिर की कि “आज शोध के क्षेत्र में नाटकों और रंगमंच के प्रति शोधकर्ताओं का रुझान कम हो रहा है।”

वस्तुत: यह संगोष्ठी भारतीय ज्ञान परंपरा के विभिन्न आयामों को समझने तथा शोध की नई संभावनाओं को उद्घाटित करने में अत्यंत सफल सिद्ध हुई। विद्वानों के सारगर्भित व्याख्यान एवं विद्यार्थियों की सक्रिय सहभागिता ने इसे एक यादगार एवं ज्ञानवर्धक अकादमिक आयोजन बना दिया।

 

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