प्रगतिशील लेखक संघ, बनारस इकाई के तत्वावधान में तथा जनवादी लेखक संघ एवं जन संस्कृति मंच के सहयोग से वरिष्ठ आलोचक एवं कवि प्रो. राजेन्द्र कुमार तथा प्रसिद्ध आलोचक वीरेंद्र यादव की स्मृति में रविवार, 18 जनवरी 2026 को श्रद्धांजलि-सभा का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम दोपहर 2 बजे से कथाकार काशीनाथ सिंह के ब्रिज एन्क्लेव, सुंदरपुर स्थित आवास पर संपन्न हुआ। उल्लेखनीय है कि 16 जनवरी 2026 को दोनों वरिष्ठ साहित्यकारों का निधन हो गया था। उनके असामयिक निधन से प्रगतिशील और जनवादी साहित्यिक परंपरा को अपूरणीय क्षति पहुँची है।
श्रद्धांजलि-सभा की अध्यक्षता प्रसिद्ध कथाकार काशीनाथ सिंह, डॉ. गया सिंह, डॉ. बलिराज पाण्डेय एवं एम.पी. सिंह ने संयुक्त रूप से की। इस अवसर पर प्रसिद्ध कथाकार काशीनाथ सिंह ने दोनों साहित्यकारों को भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि उनकी पूरी पीढ़ी धीरे-धीरे विदा हो रही है—वह पीढ़ी जिसने गुलामी के दिन देखे और समाज के बीच रहकर सच को बेबाकी से कहा। उन्होंने कहा कि प्रो. राजेन्द्र कुमार एक अत्यंत सहज, बहुआयामी और प्रतिबद्ध लेखक थे, जिनके विचार यथार्थ को स्वीकार करते हुए सामाजिक परिवर्तन की उम्मीद जगाते थे। वहीं वीरेंद्र यादव को याद करते हुए उन्होंने कहा कि उनके जाने से ऐसा लगता है जैसे छोटा भाई चला गया हो—वे अत्यंत सरल, निष्कलुष और स्पष्ट वक्ता थे।
डॉ. गया सिंह ने कहा कि राजेन्द्र कुमार और वीरेंद्र यादव का जाना साहित्य जगत के लिए वज्रपात के समान है। उन्होंने राजेन्द्र कुमार की रचनात्मक सक्रियता और वीरेंद्र यादव की निर्भीक आलोचनात्मक दृष्टि को विशेष रूप से रेखांकित किया। जन संस्कृति मंच से प्रो. बलिराज पांडेय ने कहा कि प्रो. राजेन्द्र कुमार अपनी विद्वता का आतंक कभी नहीं बनाते थे और एक बहुआयामी व्यक्तित्व के रूप में सामने आते थे। वीरेंद्र यादव के संदर्भ में उन्होंने कहा कि उनकी आलोचना उपन्यास, सत्ता और वर्चस्व की संरचनाओं को चुनौती देने वाली थी। डॉ. एम.पी. सिंह ने कहा कि इन दिनों पूरा साहित्य जगत शोकाकुल है और दोनों साहित्यकारों का जाना अत्यंत हृदयविदारक है।
बीएचयू के वरिष्ठ प्रोफेसर आशीष त्रिपाठी ने कहा कि प्रो.राजेन्द्र कुमार एक आलोचक ही नहीं, बल्कि एक जीवंत संगठन की तरह थे, जिनकी दृष्टि में जनपक्षधरता और सामाजिक चेतना प्रमुख थी। उन्होंने वीरेंद्र यादव को अस्मितावादी चेतना और सांस्कृतिक वर्चस्व के प्रश्नों को आलोचना में स्थापित करने वाला महत्वपूर्ण आलोचक बताया। प्रो. सदानंद शाही ने कहा कि ऐसा लगता है मानो श्रद्धांजलि के लिए शब्द कम पड़ गए हों। दोनों साहित्यकारों का जाना साहित्य जगत के लिए बड़ी क्षति है। शिवकुमार पराग ने कहा कि प्रो. राजेन्द्र कुमार एक सुबोध अध्यापक थे, जो मुक्तिबोध और अज्ञेय दोनों पर समान अधिकार से बोल सकते थे।
डॉ. संजय श्रीवास्तव ने कहा कि दोनों साहित्यकार साहित्य जगत के मजबूत स्तंभ थे और उनके जाने से यह स्तंभ हिल गया है।
प्रो अवधेश प्रधान जी ने सभा में बोलते हुए कहा कि इन रचनाकारों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम सांस्कृतिक संगठनों की एकता को प्रगाढ़ करें और अपने समय के ज्वलंत प्रश्नों पर खूब बहस करें। श्रद्धांजलि-सभा में प्रो. नीरज खरे, प्रो. वंदना चौबे, डॉ.ओमलता पांडेय, प्रो. प्रभाकर सिंह, डॉ.विंध्याचल यादव, डॉ. आनंद तिवारी एवं श्री अशोक आनंद ने भी अपनी श्रद्धांजलि अर्पित किया। कार्यक्रम का संचालन प्रो गोरख नाथ ने तथा धन्यवाद ज्ञापन पुरुषार्थ सिंह ने किया।

आज की इस श्रद्धांजलि सभा में जिनकी विशेष उपस्थिति रही उनमें डॉ. महेंद्र प्रसाद कुशवाहा, डॉ. शैलेन्द्र सिंह, पिंकी उपाध्याय, जितेंद्र सिंह, शुभम पाठक, पुष्पम कुमार के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं।

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