प्रसिद्ध आलोचक डॉ. नामवर सिंह की जन्मशती पर उदय प्रताप कॉलेज, वाराणसी के हिंदी विभाग के तत्वावधान में आयोजित ‘डॉ. नामवर सिंह : हिंदी आलोचना का संवादी स्वर’ विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी के प्रथम सत्र ‘डॉ. नामवर सिंह : काव्य चिंतन की अन्तर्ध्वनियां’ रहा। इस सत्र की अध्यक्षता करते हुए हमरे समय के महत्वपूर्ण कवि-आलोचक प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि नामवर को नामवर ने नहीं, बल्कि उनकी परंपरा ने बनाया, उनकी परंपरा की समझ ने बनाया। उन्होंने रेखांकित किया कि नामवर जी को गहराई से समझने के लिए उनके परिवेश को टटोलना होगा। वे ज्ञानोन्मुखी परंपरा से जुड़ते हुए आलोचना के सर्वोच्च शिखर तक पहुंचे। इस सत्र में बोलते हुए प्रो. अरविंद त्रिपाठी ने डॉ. नामवर सिंह की आलोचना और उनके संवादी स्वर पर चर्चा करते हुए कहा कि उनकी आलोचना का क्षेत्र किसी विशाल गंगा के पाट की तरह असीमित है। उन्होंने दिलचस्प टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि वे कवि न होते, तो इतने बड़े आलोचक भी नहीं बन पाते; असल में कविता की खोज करते-करते ही वे आलोचक बने। जनकवि शिवकुमार ‘पराग’ ने अपने संबोधन में कहा कि एक सच्चा आलोचक ही कविता के मूल स्वर को पाठक के मर्म तक पहुंचाता है, और नामवर जी ने इस दायित्व को अत्यंत कुशलता के साथ निभाया। वे किसी भी कविता के सौंदर्य पक्ष और आंतरिक गहराइयों को परत-दर-परत खोलने में पूरी तरह निपुण थे। प्रो. कमलेश शर्मा ने अपने वक्तव्य में कहा कि आज के दौर में छायावादी काव्य को सही अर्थों में समझने के लिए आचार्य नामवर सिंह को पढ़ना सबसे अधिक आवश्यक है। उनके अनुसार, नामवर जी को पढ़े बिना छायावाद की मूल चेतना और उसके सौंदर्य को पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। इस बौद्धिक सत्र संचालन डॉ. विवेक सिंह ने किया तथा आभार डॉ. अरविंद सिंह ने किया।

संगोष्ठी के दूसरे सत्र विषय “आलोचक नामवर सिंह : इतिहास और परम्परा का आख्यान” था। इस सत्र में अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए प्रो. संजीव कुमार ने कहा कि डॉ. नामवर सिंह दुनिया भर के नए से नए वैचारिक आंदोलनों और प्रवृत्तियों को लेकर हमेशा अपडेट रहते थे। वे आजीवन एक उत्कृष्ट और समर्पित पाठक बनकर समय के साथ खुद को लगातार परिष्कृत और मांजते रहे। हिंदी साहित्य में नामवर जी की उपस्थिति मात्र एक आलोचक की नहीं, बल्कि संपूर्ण हिंदी आलोचना की जीवंत शक्ति है। प्रो.रघुवंशमणि ने अपने वक्तव्य में कहा कि डॉ. नामवर सिंह की आलोचना में ऐसी पर्याप्त और उर्वर संभावनाएँ मौजूद हैं, जिनमें हर युग में आने वाली नई पीढ़ियाँ अपने समय के अनुसार अपना नया अर्थ खोजेंगी। प्रो. सूरज बहादुर थापा ने अपने संबोधन में कहा कि नामवर जी जटिल से जटिल साहित्यिक और वैचारिक प्रसंगों को पाठकों के लिए सहज व सरल बनाते थे, किंतु उन्होंने कभी भी उन्हें सरलीकृत नहीं होने दिया। उन्होंने छायावादी कविता में प्रकृति चित्रण की बेहद सटीक और वैज्ञानिक व्याख्या करते हुए छायावाद को एक नया और विस्तृत क्षितिज प्रदान किया। इस सत्र संचालन डॉ. महेंद्र प्रसाद कुशवाहा द्वारा किया गया तथा आभार प्रो. सुधीर राय के प्रकट किया।
संगोष्ठी की समाहार वक्तव्य देते हुए वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ने अपने संस्मरणों और गुरु को याद करते हुए अत्यंत भावुक और विचारोत्तेजक बातें कहीं। उन्होंने कहा कि डॉ. नामवर सिंह केवल साहित्य के साधारण व्याख्याता भर नहीं थे, बल्कि वे शब्दों के भीतर छिपे समय, समाज और मनुष्य के मूल सत्य को उद्घाटित करने वाले एक अत्यंत सजग आलोचक थे। गजानन माधव मुक्तिबोध की रचनात्मकता को केंद्र में रखते हुए नामवर जी के योगदान को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि वे अगाध और बहुत अधिक पढ़ते थे, और यही कारण है कि उनके विराट अध्ययन और उनकी गहराई को पूरी तरह समझना हर किसी के लिए बहुत कठिन कार्य है।

सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रख्यात आलोचक प्रो. अवधेश प्रधान ने अपने वक्तव्य में कहा कि आचार्य डॉ. नामवर सिंह को महज आलोचना और प्रशंसा की सीमित भाषा में नहीं समझा जा सकता, क्योंकि वे गहरे अंतर्विरोधों से युक्त व्यक्तित्व थे। उन्होंने रेखांकित किया कि वे तर्क के इतने बड़े उस्ताद थे कि एक ही कवि को अच्छा और खराब दोनों रूपों में बेहद अकाट्य ढंग से सिद्ध कर सकते थे। इतना ही नहीं, वे अपनी ही आलोचना से प्रसन्न होने वाले अनूठे आलोचक थे, जो अपने जीवन के अंतिम समय तक आचार्य रामचंद्र शुक्ल का नियमित अध्ययन करते रहे।

इस बौद्धिक सत्र का अत्यंत सधा हुआ, जीवंत और प्रवाहमयी संचालन रवि शंकर सोनकर द्वारा किया गया। अंत में डॉ. रमेश प्रताप सिंह ने संगोष्ठी में पधारे सभी आगत अतिथियों, विद्वान वक्ताओं, शोधार्थियों और श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त किया। इसी के साथ इस भव्य राष्ट्रीय संगोष्ठी का सफलतापूर्वक समापन हुआ। आरंभ प्रतिभागियों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किया जिसकी अध्यक्षता प्रो. अनिता सिंह एवं डॉ. प्रवीण कुमार यादव ने किया इस सत्र का संचालन डॉ. विकास सिंह ने किया तथा आभार डॉ. पूनम सिंह ने प्रकट किया। इस अवसर पर श्री मदन कश्यप, प्रो. तरुण कुमार, श्री भालचंद्र जोशी, प्रो.अरविंद त्रिपाठी, प्रो.धर्मेंद्र कुमार सिंह, डॉ.गया सिंह, प्रो. शशिकांत द्विवेदी, श्री अजय राय,डॉ. रासुधार सिंह, प्रो. रमेश धर द्विवेदी, डॉ. विंध्याचल यादव, डॉ. प्रदीप कुमार सिंह, प्रो.प्रकाश उदय, प्रो. मनोज प्रकाश त्रिपाठी, प्रो. देवेन्द्र कुमार सिंह, प्रो. पंकज कुमार सिंह, डॉ.आनंद राघव चौबे , डॉ.चंद्रशेखर सिंह, डॉ. अनुराग उपाध्याय, डॉ. देवेश चंद्र, डॉ. नवीन कुमार यादव, डॉ. विजय कुमार सिंह, डॉ. विनोद पाल, डॉ. सतीश प्रताप सिंह, डॉ. अनिरुद्ध चौधरी, डॉ. विनीत राय सहित बड़ी संख्या में अध्यापक एवं छात्र-छात्राएं उपस्थित रहें।

