जानकी देवी मेमोरियल कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की एसोसिएशन ‘ज्ञान मंजूषा’ द्वारा ‘साहित्य का पाठ और पुनर्पाठ’ पर विशेष शिक्षणात्मक व्याख्यान हुआ। हिंदी विभाग के सभी सदस्यों के लिए साहित्य की पाठशाला आयोजित की गई थी। जिसमें साहित्य के पाठ और पुनर्पाठ विषय पर एक अत्यंत रोचक, सार्थक एवं चिंतनपरक व्याख्यान हुआ। लगभग ढाई घंटे चले इस अकादमिक सत्र में जे.एन.यू. से पधारे प्रो. देवशंकर नवीन ने साहित्य के शिक्षण और अध्ययन की नवीन संभावनाओं पर विस्तृत एवं प्रभावी संवाद किया।व्याख्यान का केंद्रीय आधार ‘रामायण की प्रासंगिकता’ तथा पाठ और पुनर्पाठ रहा। प्रो. नवीन जी ने इस संदर्भ में रेखांकित किया कि साहित्य को केवल निर्धारित पाठ के रूप में ग्रहण करने के बजाय उसके नए पाठ, नए संदर्भ, नई दृष्टि और नए विचारों के साथ पुनर्व्याख्यायित किया जाना आवश्यक है। पाठ-पुनर्पाठ की प्रक्रिया किस प्रकार साहित्यिक कृतियों और विधाओं में छिपे नए तथ्यों, नए अर्थों और नए सत्य-बोध को सामने ला सकती है, इसपर उन्होंने सार्थक विमर्श प्रस्तुत किया। सत्र में विशेष रूप से इस आवश्यकता पर बल दिया गया कि पाठ्यक्रम को समय, समाज और बदलती बौद्धिक आवश्यकताओं के अनुरूप अधिक समृद्ध, संवादपरक और दृष्टिसंपन्न बनाया जाए। साहित्य के शिक्षण में आलोचनात्मक चिंतन, बहुआयामी पाठ और पुनर्पाठ की भूमिका को रेखांकित करते हुए व्याख्यान ने उपस्थित सदस्यों को अपने-अपने शिक्षण अनुभवों पर नए सिरे से विचार करने के लिए प्रेरित किया। समूचा सत्र ज्ञानवर्धक, संवादपरक और बेहद प्रेरणादायी रहा। हिंदी विभाग के सभी सदस्यों के लिए यह व्याख्यान साहित्य के अध्ययन-अध्यापन को नई दिशा और दृष्टि प्रदान करने वाला एक महत्वपूर्ण अकादमिक अनुभव सिद्ध हुआ। आयोजन का प्रारंभ संयोजक डॉ. विनय कुमार ने किया और धन्यवाद ज्ञापन प्रो. सुधा उपाध्याय ने किया।

 

इसी क्रम में छात्राओं और अध्यापकों द्वारा प्रस्तुत लोकगीतों की सुरमयी गूंज से और अतिथि रूप में आए डॉ. गुंजन कुमार झा के गायन से कॉलेज का परिसर गुंजायमान हुआ। लगातार लगभग तीन घंटे तक लोकगीतों, लोकधुनों और लोकस्वरों की ऐसी रसधारा प्रवाहित हुई कि पूरा वातावरण अपनी माँ-बोली और लोक-संस्कृति की आत्मीय गूंज से भर उठा। विभिन्न विभागों से आए अध्यापकों और विद्यार्थियों को अपनी-अपनी मातृभाषाओं एवं लोकपरंपराओं के गीत प्रस्तुत करते सुनना अपने आप में अत्यंत रोमांचकारी और भावपूर्ण अनुभव रहा। विविध अंचलों की लोकधुनों, गीतों और लोककलात्मक अभिव्यक्तियों ने न केवल मनोरंजन किया, बल्कि हमारी समृद्ध लोक-स्मृति, सांस्कृतिक विविधता और भाषायी विरासत को भी जीवंत किया।

 

About Author

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *